Thursday, September 24, 2009

‘पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर...’


न जाने कब से ताने सुन रहा हूं कि अपने भोपाली होने पर इतना ग़ुरूर रखते हुए भी अब तक भोपाल के लोगों की बात ही नहीं कर रहा. सचमुच. अपने लोग दिल के इतने क़रीब होते हैं कि उनके बारे में लिखने का ख्याल ही नहीं आता. खैर! जो कल तक नहीं किया वो आज किए लेते हैं.

चलिए, सोचिए. एक ऐसे परिचय वाले इंसान के बारे में सोच देखें कि वो क्या रहा होगा. ...सारा जीवन आर्थिक संघर्षों में बीता. वे निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे. पढाई-लिखाई न हो सकी. छोटी सी उम्र में ही भोपाल की सड़कों पर तांगा चलाने से अपना जीवन शुरू किया फिर होटलों में नौकरी की... .

अब अगर मैं कहूं कि यह शख़्स कमाल का इंसान और लाजवाब शायर था तो आपको मेरी बात पर यूं ही यकीन नहीं कर लेना चाहिए. खुद ही सुनकर देख न लीजिए कि मैं कितना सच बोल रहा हूं.

मैं चाहता हूं निज़ाम-ए-कुहन बदल डालूं

मगर ये बात फक़त मेरे बस की बात नहीं

उठो बढ़ो मेरी दुनिया के आम इंसानों

ये सब की बात है दो-चार दस की बात नहीं

इसे कहते हैं ताज भोपाली की शायरी. यानी शहर भोपाल के मोहम्मद अली ताज. 1926 में पैदा हुए और 12, अप्रेल 1978 तक बाकायदा जीते रहे और बहुतों को जिलाते रहे. कभी अपनी मोहब्बत से, कभी अपनी शायरी से और कभी-कभी अपनी बातों से. शक्लो-सूरत की परवाह उन्होने कभी नहीं की न किसी और ने. फिर भी उनका धुर काला रंग यूं दमकता रहता था मानो अभी-अभी कोई ग़ज़ल हुई है या शेर बना है जो बिना ज़ुबान पर आए ही चेहरे पर नुमाया हो गया है. उन्हें देखकर यक-ब-यक ग़ालिब का शेर याद आ जाता था बनाकर फक़ीरों का हम भेस ग़ालिब / तामाशा-ए-अहले-करम देखते हैं.

अपनी इस फक़ीराना तबियत से उन्हें इस क़दर आशनाई थी कि जब 60 के दशक में उन्हें अशोक कुमार के सेक्रेटरी जनाब एस.एम.सागर ज़िद कर फिल्मों में गीत लिखने को बम्बई ले गए तो थोड़ा-बहुत वक़्त ही वहां रह पाए. भोपाल की गलियों की सदा उनके कानो में ऐसी गूंजती रही कि काम-धाम छोड़-छाड़ वापस लौट आए.

1969 की फिल्म आंसू बन गए फूल तो आपको याद होगी. न भी याद हो तो यह गीत तो याद आ ही जाएंगे. इलेक्शन में मालिक के लड़के खड़े हैं / इन्हें कम न समझो ये खुद भी बड़े हैं किशोर कुमार की आवाज़ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत के साथ चुनाव और नेताओं पर खूबसूरत व्यंग.

इसी गीत की लाईने है कि इस शहर में जितने हैं, अखबार इनके हैं / काले-सफेद सैकड़ों व्यापार इनके हैं / ...सब अस्पताल इनके हैं, बीमार इनके हैं / परनाम लाख बार करो / इनको वोट दो / वादों पे ऐतबार करो इनको वोट दो. इसी फिल्म का दूसरा गीत आशा भोंसले ने क्या खूब गाया है –‘ महरबां, महबूब, दिलबर, जानेमन / आज हो जाए कोई दीवानापन.

यह ताज साहब का एक रूप है. दूसरे रूप में उन्हें देखिए तो पहचानना मुश्किल हो जाए.

नुमाइश के लिए जो मर रहे हैं

वो घर के आइनों से डर रहे हैं

बला से जुगनूओं का नाम दे दो

कम-से-कम रोशनी तो कर रहे हैं

***

तुम्हे कुछ भी नहीं मालूम लोगो

फरिश्तों की तरह मासूम लोगो

ज़मीं पर पांव आंखें आस्मां पर

रहोगे उम्र भर मग़मूम लोगो

रहोगे कब तलक मज़लूम लोगो

***

निर्वाण घर में बैठ के होता नहीं कभी

बुद्ध की तरह कोई मुझे घर से निकाल दे

पीछे बन्धे हैं हाथ मगर शर्त है सफर

किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे

अफसोस ताज साहब को अपने पांव के कांटो और दिल के छालों के साथ ही सफर पूरा करना पड़ा। पूरे 52 साल का सफर।

6 comments:

  1. ताज भोपाली के बारे में बढ़िया जानकारीपूर्ण आलेख प्रस्तुति के धन्यवाद.

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  2. निर्वाण घर में बैठ के होता नहीं कभी
    बुद्ध की तरह कोई मुझे घर से निकाल दे
    पीछे बन्धे हैं हाथ मगर शर्त है सफर
    किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे

    लाजवाब...बेमिसाल...वाह...
    नीरज

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  3. ताज और शेरी भोपाली की शायरी ने भोपाल का नाम खूब रोशन किया है । आधे भोपाली तो हम भी हैं । और इस बात का ग़ुरूर है हमें ।

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  4. सर,
    आप ब्लॉग पर दिखने और लिखने लगे हैं, ये बहुत ही खूबसूरत बात और हालात हैं....
    हम लोग आपके कोलम को भास्कर में सदैव पढ़ रहे हैं...कभी मिस हो भी जाता है, तो पुराना अखबार निकलवा कर भी पढ़ते हैं... आपकी यह पोस्ट भी वहीं पढ़ी जा चुकी है, लेकिन ब्लॉग पर फिर से पढ़कर वही पुराना मज़ा दुबारा से प्राप्त किया है...
    आभार....

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  5. Amar Hindustani-sir aapko sadar pranam sir main aapka bahut bada fan hun main aapka lekh kabhi miss nahi karta "chandra tare suraj tare tare jagat vyavhar per jis din aapka lekh aaye na tare us din ka akhbar -

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