Friday, October 2, 2009

एक गुंडा, जो कवि भी था

बात शुरू करने से पहले एक बात बताना ज़रूरी समझता हूं. बात ऐसी है कि आज मैं एक गुंडे की बात करने वाला हूं. मतलब वो कोई ऐसा-वैसा गुंडा नहीं था जो सिर्फ सड़कों पर गुंडई करता रहा हो, वह बाकायदा कवि भी था. इस गुंडे कवि का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित है. नाम बताऊं ? नाम है ‘बदमाश दर्पण’. है न बिलकुल सही, कवि के चरित्र के अनुरूप नाम.

इससे पहले कि हम लोग इन गुंडे महाशय की कविताएं पढ़ें, ज़रा उनके बारे में, उनकी पृष्ठभूमि के बारे में बात कर लें तो कविताओं को समझने में थोड़ी मदद मिल जाएगी.

सबसे पहली बात तो यह कि इस गुंडे का नाम है – तेग़ अली. इनके व्यक्तित्व के बारे में पुस्तक ‘बदमाश दर्पण’ में पुस्तक के सम्पादक नारायण दास लिखते हैं ‘ पचास के कोठे में सिन. फिर भी युवकोचित बलिष्ठ दृढ़ शरीर. छह फुट ऊंचा क़द. सर पर छोटे घुंघराले बालों पर सुनहरे पल्ले का साफा. बिछू के डंक की तरह नुकीली चढ़ी हुई मूछे. सांप की तरह सांवले रंग की, चिकनी चमकीली काया. शरीर पर रेशमी लाल किनारे की नगपुरी धोती. कमर में बनारसी सेल्हे का कसा हुआ फेंटा. फ़ेंटे में खुंसा आबनूस की मूठ का तीखी धार का बिछुआ. हाथ में टीके से हाथ भर ऊंची पक्के मिर्ज़ापुरी बांस की लाठी, जिसे बड़े प्यार से तेल पिला-पिला कर पाला गया. जेठ-वैसाख की कड़ी धूप. सावन-भादों की झड़ी और माघ-पूस की कड़कड़ाती ठण्ड में भी नंगे बदन.

यह था तेग़ अली का व्यक्तित्व जो ईसा की उनीसवीं शताब्दी के मध्य में अपने उरूज़ पर थे. तेग़ अली पूरी तरह से बनारसी थे. वहीं जन्मे,पले और बड़े हुए और वहीं गुंडई का पेशा अपनाया. वे भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के काल में जन्मे और उनके भारतेन्दु मंडल में भी शामिल थे. तेग़ अली की ग़ज़लों ने अपने समय में ही काफी असर दिखाना शुरू कर दिया था. और तो और स्वयं भारतेंदु ने जब एक काल्पनिक मुशायरे का वर्णन लिखा तो उसमें तेग़ अली की कुछ ग़ज़लों को भी शामिल किया.

गुण्डा शब्द सुनते ही किसी भी व्यक्ति ऐसी घृणित छवि हमारे सामने बन जाती है कि उससे नफरत सी होने लगती है मगर तेग़ अली हमारे दौर का गुण्डा नहीं है जो किसी राजनैतिक दल की टोपी पहन कर लूट-पाट करता हो. वह कोई 150 साल पहले की काशी (बनारस) का गुण्डा है. उस दौर में गुण्डे से आशय था ऐसा व्यक्ति जो अपनी आन मर मिटता हो. कमज़ोर और मज़लूम लोगों की रक्षा करता हो. ऐसे लोगों को काशी में गुंडा कहा जाता था. गुण्डा शब्द की उत्पति संस्कृत के गुण्ड से बताई जाती है. ‘गुण्डयति का अर्थ है ‘आश्रय में आछादित कर लेना, रक्षा करना’.

तो खैर मुद्दा यह कि तेग़ अली संगीत के बेहद शौकीन थे. ‘भोजपुरी भाषा और साहित्य’ में पं. उदयनारायण तिवारी कहते हैं. तेग़ अली बड़े मस्त जीव थे, काशी के गवैयों के अखाड़े के आप सरदार थे. होली के दिनो में आप अपना दल लेकर घूमते थे और आशु कविता करते हुए लोगों का मनोरंजन करते थे. तेग़ अली की कविता में मुहावरों की सफाई है’.

हां, इससे पहले कि हम तेग़ अली की कविताएं पढ़ना शुरू करें, एक बात और जो आपको उनकी कविताओं में भी दिखाई देगी, वह है उनका धार्मिक सहिष्णु रूप. अपने धर्म का पाबन्द होने के साथ ही वह राम,कृष्ण,दुर्गा और गंगा की बात करता है और उनकी कसमे खाता है. उसकी कविता की भाषा ही भोजपुरी है.



तेग़ अली की शायरी में बला की ईमानदारी है. अपनी गुंडई के धन्धे को इतनी सहजता और ईमानदारी से क़ुबूल करता है कि जी चाहता है कि देश भर के भ्रष्ट,बदमाश लोगों को पूरा का पूरा ‘बदमाश दर्पण’ सुबह 5 बजे से 8 बजे तक और रात को 9 बजे से 12 बजे तक रोज़ पढ़ाने का कानून बनवा दूं.

अपनी ‘बटलै बा’ शीर्षक वाली ग़ज़ल में अपने बारे में कहते हैं -

दुआरे राजा के जुआ परल बा जाना ला
रजा अधेली का पत्ती हमार बटले बा

अर्थ यह है कि तुम को तो मालूम ही है कि राजा दरवाज़े में जुआ होता है और उस जुए के अड्डे पर होने वाली नाल की आमदनी में मेरा आधे की साझेदारी है.

भाई साहब गुण्डे थे तो क्या इश्क़ तो वे भी करते थे सो अपनी माशूक़ से भी बात देखिए किस अन्दाज़ से करते हैं. वादा करके माशूक़ नहीं आया तो किस क़दर गुस्सा चढ़ आया तो फौरन फौजदारी की धमकी भी दे डाली.

रोज कह जाला कि आईला से आवत बाट
सात चौदह का ठेकाना तूं लगावत बाट

मतलब यह कि तुम रोज़-रोज़ मुझसे कह कर जाती हो कि अभी आती हूं लेकिन अभी तक तो तुम्हारा कोई पता नहीं है. यह तो तुम मुझे सात से चौदह साल की जेल भिजवाने का इंतज़ाम कर रही हो.

अछा यह कोई कोरी धमकी नहीं थी. बन्दे ने एक सचमुच ऐसा कर भी दिखाया. मतलब पूरी तरह तो नहीं मगर अटैक तो कर ही दिया. अब देखिए वे उस घटना को कैसे बता रहे हैं.

पेटे
पे छुरी धइली ता बोलल कि रामधै
जीयत रहब फेर कबौं आज कल करब

मैने उसके पेट पर छुरी रख दी तो वह बोला कि राम कसम अब अगर ज़िन्दा बच जाऊं तो फिर कभी आज कल का झूठा वादा करने से मेरी तौबा.

यह तो हुआ इनका एक रूप, दूसरे रूप में उसी माशूक़ के लिए जान लड़ाने को तैयार हो जाते हैं.

केहू का डर हौ कह दा लगाईं सारे से
तमासा मेला में गंगा के पार बहरी ओर

पार्टी यहां कह रही है कि तुमको अगर किसी का डर हो तो बस ज़रा मुझे बता दो. वो साला कहीं किसी मेले में, तमाशे में या गंगा के पार मिल जाए तो लाठी लेकर लड़ लूं.

ज़रा सा ग़ौर करने पर पता चलता है कि इस गुण्डे भाई को सचमुच ही वो ‘साला’ मिल ही गया मगर थोड़ा जबरा निकला. उसने तेग़ अली का ही सर फोड़ दिया सो अब वो माशूक़ से उसकी कीमत मांग रहा है.

बिन चुकौले लहू का मोल छोड़ब तोहे रजा
गोजी से बा कपार गयल फट तोरे बदे

इसका मतलब बोले तो यह है कि तुम्हारे पीछे लाठी-बाज़ी करने में मेरी खोपड़ी भी लाठी का वार खा कर फट गई है. अब मै अपने खून का मोल वसूले बिना नहीं छोड़ूंगा.

इस सारी बात का मतलब यह नहीं कि तेग़ अली अपनी माशूक़ से सिर्फ ऐसी गुंडई की बातें ही करता है. उसकी शायरी में माशूक़ को लेकर बहुत कोमल भावनाओं का इज़हार भी है. अब ज़रा यह कुछ शेर देखें :

हम खरमिटाव कइली है रहिला चबाय के
भेंवल धरल बा दूध में खजा तोरे बदे

(मैने तो चना चबाकर सुबह का नाश्ता कर लिया है मगर तुम्हारे लिए दूध में खाजा भिगो कर रखा हुआ है)

जरदोजी जूता टोपी डुपट्टा बनारसी
से ले ली आज रजा तोरे बदे

( ए राजा, आज मैने तुम्हारे लिए दुकानदार से सोने के तार और सलस्मा सितारों से जड़ी टोपी, मखमल साटन के जूते और बनारसी दुपट्टा झटक लाया हूं)

तो ऐसा था यह गुण्डा कवि तेग़ अली.

और एक बात. तेग़ अली के कुछ शेर पढ़ते हुए उसी भावना के बड़े शायरों के कुछ शेर मुझे याद हो आए. मिसाल के तौर पर यह एक शेर.

का माल असरफी हौ रुपैया तोरे बदे
हाज़िर बा जिउ समेत करेजा तोरे बदे

हमारे आज के प्रसिद्ध शायर शहरयार साहब ने फिल्म ‘उमराव जान’ के लिए लिखा ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए’.

कहने का मतलब यह कि कोई कितना भी बड़ा गुण्डा क्यों न हो, आखिर को प्रेम उसमें छुपे बेहतर इंसान को बाहर आने पर मजबूर कर ही देता है.

6 comments:

  1. आपने तो काफी लंबा चौदा लिख दिया है इस कवी गुंडे के बारे में

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  2. are bhojpurii me itane sundar sher...
    gorakhpuriyaa hone ke baavzood

    shukriyaaa

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  3. VERY NICE...... PRESENTATION SUPERB.

    R.P.Asthana

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  4. R B Dwivedi, AllahabadOctober 13, 2009 at 7:45 PM

    very informative and interesting.keep it up.

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  5. गुंडा कवि की दास्‍तां मोहित कर गई। ऐसे ही गुंडों की दरकार है पर वे गुंडे आज नहीं हैं। आजकल तो गुंडों की सरकार है और उन गुंडों के बारे में न कोई लिखना चाहता है, न कोई पढ़ना। सिर्फ वे ही चाहते हैं ऐसा करना, जिन्‍हें उन्‍हें पाने की आस हो। वैसे गुंडे के नाम से सांस रूकती है जबकि कवि कहने से सांस चलती है। पर गुंडा कवि कहने से सांस भरने को बाध्‍य होना पड़ता है। बदमाश दर्पण की अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    आपको इस बात के लिए भी बधाई कि आज दिनांक 27 अक्‍टूबर 2009 को दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज पर समांतर स्‍तंभ में एक गुंडा कवि शीर्षक से आपकी यह पोस्‍ट प्रकाशित हुई है।
    उम्‍मीद करना चाहूंगा कि इस प्रकार के गुंडों पर और सामग्री उपलब्‍ध करवाई जाये और अगर गुंडा लेखक, गुंडा व्‍यंग्‍यकार, कहानीकार इत्‍यादि को खोजने में सफलता पाई जाये तो साहित्‍य के साथ साथ गुंडों में भी समाज के लिए कर गुजरने का जज्‍बा पैदा हो सके। जिस प्रकार वाल्मिकी डाकू से कवि बने। इस प्रकार के प्रसंग मन को भाते हैं।

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