Friday, October 9, 2009

शशिन : जो सपना नहीं बनना चाहता था




पिछले महीने एक कार्यक्रम के सिलसिले में जबलपुर जाना हुआ. प्रसिद्ध रंगकर्मी मित्र अरुण पाण्डेय का भी साथ रहा. उन्होने एक बहुत ही बहुमूल्य चीज़ दी – शशिन की स्मृति में बरसों पहले प्रकाशित एक पुस्तिका. इस पुस्तक में शशिन के कुछ छाया चित्र, कविताएं हैं, संस्मरण हैं.

मैने अब तक शशिन का नाम भर सुना था. उसके कुछ चित्र सारिका में देखे थे. खासकर अक्टूबर 1969 का अंक जिसमें सारे रंगीन और सादे फोटो शशिन के ही थे. इससे ज़्यादा कुछ नहीं जानता था. इस पुस्तिका को पढ़ना शुरू किया तो लगा मैं एक बहुत ही खूबसूरत इंसान को जानने से महरूम रहा हूं. जितने सुन्दर ब्लैक एंड व्हाईट चित्र हैं उतनी ही सुन्दर कविताएं.

एक चित्र मैने भी इस पुस्तक को पढ़कर बनाया है. शशिन का चित्र. वह फिलहाल मेरे ज़हन में है. ज्यों-ज्यों इस पुस्तिका के पन्ने पलटता हूं, त्यों-त्यों इस चित्र के रंग और निखरने लगते हैं. जिस दिन यह तस्वीर पूरी हुई उस दिन उसे सबको दिखाऊंगा. फिलहाल तो हरिशंकर परसाई के शब्दों का ही सहारा ले रहा हूं.

“...‘प्रहरी’ दफ्तर में ही एक दिन शशिन से मेरा परिचय कराया गया – शशिन यादव उभरते हुए कलाकार. शशिन ने तब किशोरावस्था पार ही की थी – दाढ़ी के कुछ ही बाल आये थे. सिर पर लम्बे चमकीले घुंघराले केश, बड़ी-बड़ी भावुक और प्रखर आंखें. शशिन तब बात करते, उठते-बैठते, चित्राकंन करते, सीढ़ियां उतरते गुनगुनाते रहते थे. यह आदत शशिन में अंत तक बनी रही, गुनगुनाते रहना. वे जब बड़े चित्रकार हो गये तब भी मैं देखता – कैमरा जमाते, फोकस ठीक करते, भारी स्टाक में निगेटिव निकालते शशिन गुनगुनाते ही रहते. यहां तक होता कि बात करते-करते शशिन बेध्यान होकर गुनगुनाने लगते और सामने वाले को लगता कि मैं तो बात कर रहा हूं और वह अपने में डूबकर गा रहा है. संगीत का यह स्रोत शशिन में निरंतर झरता था और तब लगता था कि यह युवक संगीतज्ञ ही बनेगा”.

मगर
शशिन अपनी इस गुनगुनाहट के साथ काम में इस क़दर डूबा रहा कि उसे यह भी पता न चल सका कि कब मौत आकर उसके दरवाज़े ठहर गई. 18 जून 1976 के दिन जब उसकी मृत्यु हुई उस समय उसकी उम्र कुल 47 साल की थी.

सब कुछ तो नहीं, बस दो कविताए और शशिन का एक फोटो है, जिस पर लिखा है - मैं चाहता हूँ / लोग मेरे चित्रों से पूछें शशिन कौन है।

1.


मैं नहीं चाहता कि

तुम सपना बनो

मैं नहीं चाहता कि

मैं भी सपना बनूं

सत्य मैं हूं सत्य रहूं

सत्य तू है सत्य रहे

तेरे दुखों से मैं संवेदित होऊं

और मेरी व्यथा को

तुम समझो

इतना कुछ

कर लेंगे हम

तो अच्छा होगा


2.


आबज़रवेटरी

सात हज़ार छै: सौ अठयासी फुट ऊंची

रोमनों के टोपों से बने कुछ

गुंबजों से घिरी

आबज़रवेटरी ?

जी हां

जहां से ऊंचे, बहुत ऊंचे,

उस आसमां में फैले

सितारों की दुनिया में

आदमी

जबसे झांकना सीखा है

तो पर्वतों की चोटियों पर

बादलों से भी ऊंचे

आबज़रवेटरी बना कर

उसने ऊपर ही ऊपर देखना जाना है

ज़मीं की सारी बातें

जैसे वह भूल सा गया है


शशिन









Thursday, October 8, 2009

An Amazing clip

How do they do this ! An amazing clip।






Wednesday, October 7, 2009

एक सुबह कोहरे की








भोपाल में बुधवार की सुबह अदभुत कोहरा छाया था। कोई ५.३० बजे जब वाक पर निकला तो दूर-दूर तक सिवा कोहरे के कुछ दिखाई न देता था। अबा ऐसे में सिवाय रूमानी होने के और किया भी क्या जा सकता था। सो बस निकल पड़ा अपना कैमरा लेकर और अगले डेढ़ घंटे तक जो कुछ करता रहा बसा उसी के कुछ नतीजे ये रहे।

घर जला भाई का भाई से बुझाया न गया


इंसानी फितरत का भी कोई जवाब नहीं. जब, जिस हाल में रहे, उस समय,काल और हाल की शिकायत किए बिना रहा नहीं जाता. अब आप आज की हालत देखें. मुझ जैसे उम्र-रसीदा लोग नए ज़माने के नए माहौल,नए दौर की ऐसे धज्जियां उड़ाने को तुले रहते हैं कि बस अल्लाह रहम करे.


सच तो यह है कि जिस कल की दुहाई दे-दे कर नए को बुरा कहा जाता है, ज़रा उस की तरफ भी एक नज़र हो जाए. नहीं, मैं कोई रामायण और महाभारत की मिसालें देकर अपनी बात साबित करने वाला नहीं हूं. बहुत दूर क्यों जाना. बस कुल मिलाकर 60-70 साल ही पीच्छे चलना है. सो चलिए, चलते हैं 1930 और40 वाले दौर में.


हां, एक बात और. पहले से बता देता हूं. यह संगीत की दुनिया है. हम लोग इसी जगह से, इसी माध्यम से तब की दुनिया देखेंगे. देखेंगे क्या, हम तो वहां तक पहुंच गए है. सो देखिये,सुनिए,सोचिए.



आजकल भारतवासी अपने भारतवासी भाईयों के साथ कितनी हमदर्दी करते हैं और अपने ह्र्दय पर कितना विश्वास करते हैं.


घर जला भाई का भाई से बुझाया न गया

क़ौम के वास्ते दुख दर्द उठाया न गया

हां रे! अपनी कोठी में किये बिजली के तो रौशन लैम्प

देव मन्दिर में तो दिया भी जलाया न गया

आप जी भर के तो खाते मलाई माखन को (लेकिन)

सूखा टुकड़ा किसी भूके को खिलाया न गया

बहू बेटियों के लिये लाख उड़ा दीं मुहरें

(लेकिन धरम के लिये कोई मांगने को आ जाये तो क्या होता है?)

धरम के काम पैसा भी लगाया न गया

वैश्याओं को तो दें (कितनी हमदर्दी रखते हैं वैश्याओं के साथ और अपनी औरतों के साथ कितनी हमदर्दी रखते हैं)

वैश्याओं को तो दें साड़ियां रेशम की बहुत

धोती जोड़ा किसी विधवा को पिनाया न गया

ग़ैरों के आगे तो जा झुकते हैं कमानी की तरह

भूल कर सर कभी मन्दर में झुकाया न गया


दोस्तों, अपने ज़माने से नाराज़ ये आवाज़ पंडित वासदेव की है. मेरा मतलब यह उनकी आवाज़ मे गाया गया गीत है जो अन्दाज़न 30 या 40 के दशक में बने 78 आरपीएम रिकार्ड पर मौजूद है. अच्छा एक बात और बता दूं. यह जो ऊपर पहला जुमला है या फिर बीच में एक टिपणी है वह भी वासदेव जी की हे है मेरी नहीं.


इसी रिकार्ड के दूसरी तरफ क्या है ज़रा उसे भी सुनें. वही अपने पंडित वासदेव जी हैं दूसरी शिकायत लेकर.


ऊपर की तरह नीचे भी ग़ज़ल के बीच-बीच में, कहीं-कहीं शुरू में ही उनकी टिप्पणियां हैं.


हमारी प्राचीन चीज़ों को आजकल किस तरह से बरता जा रहा है. उनका क्या नाम रखकर उनसे क्या काम लिया जा रहा है :


सारी बहार गुलिस्ताने रीडर ने छीन ली

रोज़ी तो पंडितॉ की टीचर ने छीन ली

बेला,चमेली,चम्पा कोई अरे सूंघता नहीं

खुशबू-ए-अतर , बू-ए लवेंडर ने छीन ली

तासीरे अर्क नाना तासीरे बादियान

आईस्क्रीम,सोडा व जिंजर ने छीन ली

रथ बहलियों के नाम तो मबज़ूल हो गये

इनकी कमाई अंजन और मोटर ने छीन ली

वेदक हकीम को तो कोई पूछता नहीं

हिकम्मत जो इनकी थी वो डाक्टर ने छीन ली

रुमाल की बहार और गुलबंद की फबन

जो कुच्छ रही-सही थी वो मफलर ने छीन ली

क्या-क्या कहूं मैं जीवा यह कलयुग के चलन

हरकत जो बूज़मां थी वो मिस्टर ने छीन ली


यह तो हुई मज़े-मज़े में शिकायत की लेकिन कुच्छ तो यह बात उस दौर की है जिसे याद कर आज न जाने कितने लोग आहें भरते होंगे कि हाय क्या ज़माना था हमारा. इसलिए कहते हैं कि बुरे से बुरी चीज़ भी वक़्त गुज़रने के साथ अपनी बुराई खो देती है. कभी-कभी तो उसे याद कर हंसी भी आ जाती है. और उस दौर की थोड़ी सी अच्छी चीज़ भी वक़्त के साथ पककर इतनी मीठी लगने लगती है कि उसके बाद सारी दुनिया की चीज़ें बेस्वाद लगने लगती हैं।


(पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' में पूर्व प्रकाशित)

Sunday, October 4, 2009

इश्क करे ऊ जिसकी जेब में माल बारे बलमूं

60-70 के दशक की भोजपुरी फिल्मों में बहुत ही खूबसूरत गीत-संगीत रचा गया है. संगीतकार चित्रगुप्त की इसमें बड़ी महती भूमिका है. ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ (1962), ‘लागी नाहीं छूटे राम’ (1963), ‘बिदेसिया’ (1963), ‘कब होइहैं गवनवा हमार’(1964), ‘भौजी’ (1965) जैसी कई फिल्मों के गीत उस दौर में काफी तूफान किये रहे. आज भी इन गीतों को सुनने पर बहुत आनंद मिलता है.

फिल्म ‘बिदेसिया’ का एक बड़ा अदभुत गीत है – ‘इश्क़ करे ऊ जिसके जेब में माल बारे बलमूं’. राममूर्ति चतुर्वेदी जी के लिखे इस गीत को संगीतकार की एस.एन.त्रिपाठी के लिये भरपूर मस्ती में गाया है मन्ना दा और महेन्द्र कपूर ने. अब तक इस गीत को डिजिटाईज़ किया नहीं है सो उसे सुना तो नहीं सकता, बस मैं सुनाए भर देता हूं.


इश्क करे ऊ जिसकी जेब में माल बारे बलमूं
कदर गंवावै जो कड़का कंगाल बारे बलमूं
अरे इश्क करे ऊ जो दिल कै दिलदार बारे बलमूं
एजी राज़े इश्क क्या समुझै चुगुल गंवार बारे बलमूं

ज़र के बिना इश्क टें टें है, ज़र होवे तो जिगर बढ़ै
ज़र के बिना न रीझे गोरिया आशिक होय बेमौत मरै

ज़र तो चलता फिरता राही, आज रहै कल जावै रे
दिलवाला बारहों महीना हंसके फाग मनावै रे
दिलवालै के जगत करे इतबार बारे बलमूं
एजी राज़े इश्क क्या समझै....

बुरे बंदगी करते डर से , अच्छे गले लगावैं रे
दिलवाले हर दिल अज़ीज़ बन दुख-सुख में मुस्कावैं रे

भाए बंद औ बाप मतारी कोई भी न साथ करै
गांठ अगर पैसा न होवै जोरू भी न बात करै
पैसे पर इस जग के सारे कमाल बारे बलमूं
एजी कदर गवांवै ...

Saturday, October 3, 2009

आलों में लुप्त ज़िन्दगियों का भान : नवीन सागर


मैं अक्सर सोचता हूं एक कहानी लिखूं, जिसका नाम हो - नवीन सागर. एक कविता लिखूं, जिसका शीर्षक हो नवीन सागर. एक आवाज़ दूं नवीन !


अब तक यह कहानी नहीं लिखी. न ही यह कविता लिखी है और न ही पिछले नौ साल से यह आवाज़ दी है नवीन ! .


डर लगता है - वह कहानी नहीं पड़ेगा. डरता हूं वह कविता भी नहीं सुनेगा. आवाज़ तो बिल्कुल नहीं दूंगा. अगर जवाब में फिर वही जुमला सुनाई दे गया आ जा बे अन्दर आ जा तो क्या करूंगा ? मैं तो उस जगह का दरवाज़ा ही नहीं जानता जहां वो जा बैठा है. तब क्या करूंगा ? बेहतर है दिल की दिल में रखूं. वह तो हमेशा दावा करता था कि मेरे दिल की सारी बातें समझ जाता है. सो अब भी तो समझता होगा.


नवीन अदभुत कहानीकार था. विलक्षण कवि. अनोखा पेंटर. यह सब न भी कहता तो भी उसकी कविता सब कुछ कह जाती. वह सब भी जो मैं अब भी नहीं कह पा रहा हूं.


1. अच्छी सरकार


यह बहुत अच्छी सरकार है

इसके एक हाथ में सितार दूसरे में हथियार है

सितार बजाने और हथियार चलाने में

तजुर्बेकार है

.

इसका निशाना अचूक है

कानून की एड़ियों वाले जूते पहनकर

सड़क पर निशाना साधे खड़ी है

उसी सड़क से होकर मुझे

एक हत्या की गवाही के लिए जाना है .


मुझसे पहले

दरवाज़ा खोलकर मेरा इरादा

बाहर निकला

तुरंत गोली से मर कर गिरा .


मैने दरवाज़े से झांककर कहा

मुझे नहीं पता यह किसका इरादा रहा

इस तरह

मैं एक अच्छा नागरिक बना

फिर मैने झूम-झूम कर सितार सुना .


2. इस घर में


इस घर में घर से ज़्यादा धुआं

अन्धेरे से ज़्यादा अन्धेरा

दीवार से बड़ी दरार.


इस घर में मर्तबा बहुत

जिसमें से सांस लेने की आवाज़ लगातार

आलों में लुप्त ज़िन्दगियों का भान

चीज़ों में थकान.


इस घर में सब बेघर

इस घर में भटके हुए मेले

मकड़ी के जालो से लिपटे हुए

इस घर में

झुलसे हुए रंगों के धब्बे

सपनों की गर्द पर बच्चों की उंगलियों के निशान .


इस घर में नींद से बहुत लम्बी रात.


3. देना !


जिसने मेरा घर जलाया

उसे इतना बड़ा घर

देना कि बाहर निकलने को चले

पर निकल न पाये .


जिसने मुझे मारा

उसे सब देना

मृत्यु न देना .

जिसने मेरी रोटी छीनी

उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना

और तूफान उठाना .


जिनसे मैं नहीं मिला

उनसे मिलवाना

मुझे इतनी दूर छोड़ आना

कि बराबर संसार में आता रहूं .


अगली बार

इतना प्रेम देना

कि कह सकूं : प्रेम करता हूं

और वह मेरे सामने हो .


(नवीन सागर २९.११.४८ - १४.०४.२०००)

Friday, October 2, 2009

एक गुंडा, जो कवि भी था

बात शुरू करने से पहले एक बात बताना ज़रूरी समझता हूं. बात ऐसी है कि आज मैं एक गुंडे की बात करने वाला हूं. मतलब वो कोई ऐसा-वैसा गुंडा नहीं था जो सिर्फ सड़कों पर गुंडई करता रहा हो, वह बाकायदा कवि भी था. इस गुंडे कवि का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित है. नाम बताऊं ? नाम है ‘बदमाश दर्पण’. है न बिलकुल सही, कवि के चरित्र के अनुरूप नाम.

इससे पहले कि हम लोग इन गुंडे महाशय की कविताएं पढ़ें, ज़रा उनके बारे में, उनकी पृष्ठभूमि के बारे में बात कर लें तो कविताओं को समझने में थोड़ी मदद मिल जाएगी.

सबसे पहली बात तो यह कि इस गुंडे का नाम है – तेग़ अली. इनके व्यक्तित्व के बारे में पुस्तक ‘बदमाश दर्पण’ में पुस्तक के सम्पादक नारायण दास लिखते हैं ‘ पचास के कोठे में सिन. फिर भी युवकोचित बलिष्ठ दृढ़ शरीर. छह फुट ऊंचा क़द. सर पर छोटे घुंघराले बालों पर सुनहरे पल्ले का साफा. बिछू के डंक की तरह नुकीली चढ़ी हुई मूछे. सांप की तरह सांवले रंग की, चिकनी चमकीली काया. शरीर पर रेशमी लाल किनारे की नगपुरी धोती. कमर में बनारसी सेल्हे का कसा हुआ फेंटा. फ़ेंटे में खुंसा आबनूस की मूठ का तीखी धार का बिछुआ. हाथ में टीके से हाथ भर ऊंची पक्के मिर्ज़ापुरी बांस की लाठी, जिसे बड़े प्यार से तेल पिला-पिला कर पाला गया. जेठ-वैसाख की कड़ी धूप. सावन-भादों की झड़ी और माघ-पूस की कड़कड़ाती ठण्ड में भी नंगे बदन.

यह था तेग़ अली का व्यक्तित्व जो ईसा की उनीसवीं शताब्दी के मध्य में अपने उरूज़ पर थे. तेग़ अली पूरी तरह से बनारसी थे. वहीं जन्मे,पले और बड़े हुए और वहीं गुंडई का पेशा अपनाया. वे भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के काल में जन्मे और उनके भारतेन्दु मंडल में भी शामिल थे. तेग़ अली की ग़ज़लों ने अपने समय में ही काफी असर दिखाना शुरू कर दिया था. और तो और स्वयं भारतेंदु ने जब एक काल्पनिक मुशायरे का वर्णन लिखा तो उसमें तेग़ अली की कुछ ग़ज़लों को भी शामिल किया.

गुण्डा शब्द सुनते ही किसी भी व्यक्ति ऐसी घृणित छवि हमारे सामने बन जाती है कि उससे नफरत सी होने लगती है मगर तेग़ अली हमारे दौर का गुण्डा नहीं है जो किसी राजनैतिक दल की टोपी पहन कर लूट-पाट करता हो. वह कोई 150 साल पहले की काशी (बनारस) का गुण्डा है. उस दौर में गुण्डे से आशय था ऐसा व्यक्ति जो अपनी आन मर मिटता हो. कमज़ोर और मज़लूम लोगों की रक्षा करता हो. ऐसे लोगों को काशी में गुंडा कहा जाता था. गुण्डा शब्द की उत्पति संस्कृत के गुण्ड से बताई जाती है. ‘गुण्डयति का अर्थ है ‘आश्रय में आछादित कर लेना, रक्षा करना’.

तो खैर मुद्दा यह कि तेग़ अली संगीत के बेहद शौकीन थे. ‘भोजपुरी भाषा और साहित्य’ में पं. उदयनारायण तिवारी कहते हैं. तेग़ अली बड़े मस्त जीव थे, काशी के गवैयों के अखाड़े के आप सरदार थे. होली के दिनो में आप अपना दल लेकर घूमते थे और आशु कविता करते हुए लोगों का मनोरंजन करते थे. तेग़ अली की कविता में मुहावरों की सफाई है’.

हां, इससे पहले कि हम तेग़ अली की कविताएं पढ़ना शुरू करें, एक बात और जो आपको उनकी कविताओं में भी दिखाई देगी, वह है उनका धार्मिक सहिष्णु रूप. अपने धर्म का पाबन्द होने के साथ ही वह राम,कृष्ण,दुर्गा और गंगा की बात करता है और उनकी कसमे खाता है. उसकी कविता की भाषा ही भोजपुरी है.



तेग़ अली की शायरी में बला की ईमानदारी है. अपनी गुंडई के धन्धे को इतनी सहजता और ईमानदारी से क़ुबूल करता है कि जी चाहता है कि देश भर के भ्रष्ट,बदमाश लोगों को पूरा का पूरा ‘बदमाश दर्पण’ सुबह 5 बजे से 8 बजे तक और रात को 9 बजे से 12 बजे तक रोज़ पढ़ाने का कानून बनवा दूं.

अपनी ‘बटलै बा’ शीर्षक वाली ग़ज़ल में अपने बारे में कहते हैं -

दुआरे राजा के जुआ परल बा जाना ला
रजा अधेली का पत्ती हमार बटले बा

अर्थ यह है कि तुम को तो मालूम ही है कि राजा दरवाज़े में जुआ होता है और उस जुए के अड्डे पर होने वाली नाल की आमदनी में मेरा आधे की साझेदारी है.

भाई साहब गुण्डे थे तो क्या इश्क़ तो वे भी करते थे सो अपनी माशूक़ से भी बात देखिए किस अन्दाज़ से करते हैं. वादा करके माशूक़ नहीं आया तो किस क़दर गुस्सा चढ़ आया तो फौरन फौजदारी की धमकी भी दे डाली.

रोज कह जाला कि आईला से आवत बाट
सात चौदह का ठेकाना तूं लगावत बाट

मतलब यह कि तुम रोज़-रोज़ मुझसे कह कर जाती हो कि अभी आती हूं लेकिन अभी तक तो तुम्हारा कोई पता नहीं है. यह तो तुम मुझे सात से चौदह साल की जेल भिजवाने का इंतज़ाम कर रही हो.

अछा यह कोई कोरी धमकी नहीं थी. बन्दे ने एक सचमुच ऐसा कर भी दिखाया. मतलब पूरी तरह तो नहीं मगर अटैक तो कर ही दिया. अब देखिए वे उस घटना को कैसे बता रहे हैं.

पेटे
पे छुरी धइली ता बोलल कि रामधै
जीयत रहब फेर कबौं आज कल करब

मैने उसके पेट पर छुरी रख दी तो वह बोला कि राम कसम अब अगर ज़िन्दा बच जाऊं तो फिर कभी आज कल का झूठा वादा करने से मेरी तौबा.

यह तो हुआ इनका एक रूप, दूसरे रूप में उसी माशूक़ के लिए जान लड़ाने को तैयार हो जाते हैं.

केहू का डर हौ कह दा लगाईं सारे से
तमासा मेला में गंगा के पार बहरी ओर

पार्टी यहां कह रही है कि तुमको अगर किसी का डर हो तो बस ज़रा मुझे बता दो. वो साला कहीं किसी मेले में, तमाशे में या गंगा के पार मिल जाए तो लाठी लेकर लड़ लूं.

ज़रा सा ग़ौर करने पर पता चलता है कि इस गुण्डे भाई को सचमुच ही वो ‘साला’ मिल ही गया मगर थोड़ा जबरा निकला. उसने तेग़ अली का ही सर फोड़ दिया सो अब वो माशूक़ से उसकी कीमत मांग रहा है.

बिन चुकौले लहू का मोल छोड़ब तोहे रजा
गोजी से बा कपार गयल फट तोरे बदे

इसका मतलब बोले तो यह है कि तुम्हारे पीछे लाठी-बाज़ी करने में मेरी खोपड़ी भी लाठी का वार खा कर फट गई है. अब मै अपने खून का मोल वसूले बिना नहीं छोड़ूंगा.

इस सारी बात का मतलब यह नहीं कि तेग़ अली अपनी माशूक़ से सिर्फ ऐसी गुंडई की बातें ही करता है. उसकी शायरी में माशूक़ को लेकर बहुत कोमल भावनाओं का इज़हार भी है. अब ज़रा यह कुछ शेर देखें :

हम खरमिटाव कइली है रहिला चबाय के
भेंवल धरल बा दूध में खजा तोरे बदे

(मैने तो चना चबाकर सुबह का नाश्ता कर लिया है मगर तुम्हारे लिए दूध में खाजा भिगो कर रखा हुआ है)

जरदोजी जूता टोपी डुपट्टा बनारसी
से ले ली आज रजा तोरे बदे

( ए राजा, आज मैने तुम्हारे लिए दुकानदार से सोने के तार और सलस्मा सितारों से जड़ी टोपी, मखमल साटन के जूते और बनारसी दुपट्टा झटक लाया हूं)

तो ऐसा था यह गुण्डा कवि तेग़ अली.

और एक बात. तेग़ अली के कुछ शेर पढ़ते हुए उसी भावना के बड़े शायरों के कुछ शेर मुझे याद हो आए. मिसाल के तौर पर यह एक शेर.

का माल असरफी हौ रुपैया तोरे बदे
हाज़िर बा जिउ समेत करेजा तोरे बदे

हमारे आज के प्रसिद्ध शायर शहरयार साहब ने फिल्म ‘उमराव जान’ के लिए लिखा ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए’.

कहने का मतलब यह कि कोई कितना भी बड़ा गुण्डा क्यों न हो, आखिर को प्रेम उसमें छुपे बेहतर इंसान को बाहर आने पर मजबूर कर ही देता है.

Thursday, October 1, 2009

कोई मरने से मर नहीं जाता


सोचते हो कि ये नहीं होगा ?

आसमां एक दिन ज़मीं होगा !

कोई मरने से मर नहीं जाता

देखना वो यहीं कहीं होगा


न जाने कबसे इस अनूठी शायरी का दीवाना बना बैठा हूं. यह इजलाल मजीद की शायरी है. एक ऐसा शायर जो अपने बारे में चाहे जितना कम बोले मगर उसकी शायरी इस शख्स के मायार के बारे में बहुत कुछ बता जाती है. यह बात और है कि वो अपनी शायरी को भी अपनी तरह खूब छुपा कर रखते हैं.


साल भर में ईद और उनके जन्म दिन (23 अगस्त) जैसे बस कुल जमा 2-3 मौके ही आते हैं जब उनके घर पर गिनती के कुछ दोस्तों का जमावड़ा होता है. इन मौकों पर ही उनसे उनकी डायरी निकलवाई जाती है और कुछ ग़ज़ल, कुछ नज़्म का दौर चलता है. इसके अलावा तो वे छपने से बचते ही रहते हैं.


इजलाल भाई उम्र में मुझसे काफी बड़े हैं. मैं भोपाल के जिस कालेज, सेफिया कालेज, में दो-एक साल पढ़ा हूं, वहां इजलाल मजीद इतिहास पढ़ाते थे. असल में लखनऊ के रहने वाले इजलाल, भोपाल में आकर ऐसे रमे कि भोपाल के ही होकर रह गए.


उस दौर में उनका खासा लम्बा कद, गोरा बल्कि सुर्ख रंगत वाला पुरकशिश चेहरा देखकर अक्सर लोग कहते थे भोपाल ग़लत आ गए. बम्बई जाना चाहिये था. फिल्मों में. उन्होने कभी इसका जवाब नहीं दिया. मगर उनकी शायरी का जवाब है क्या इस गहराई का इंसान ऐसी कोई तमन्ना भी पाल सकता है?.


दरिया चढ़ा तो पानी नशेबों में भर गया

अब के भी बारिशों में हमारा ही घर गया


***


अपने हाथ कहां तक जाते, भाग दौड़ बस यूं ही थी

उनके बांस बहुत थे लम्बे, जो कनकैया लूट गए

बाहर धूप थी शिदत की, और हवा भी थी अन्दर बेचैन

गुबारे वाले के आखिर को, सब गुबारे फूट गए


***


कहां आंसू भरी आंखों ने देखा

तमाशा देखने वालों ने देखा

कि एक आवाज़ पत्थर हो गई है

पलटकर देखने वालों ने देखा