अजब हाल में हूं. दो साल पहले तक रूमी बाबा में ऐसा डूबा था कि दुनिया में कुछ और दिखाई ही न देता था. दो साल पहले जब पुस्तक ‘जहान-ए-रूमी’ प्रकाशित हो गई तो धीरे-धीरे फिर से अपने पुराने हाल में लौट आया.
वही इस ख़्वार दुनिया में अपने हिस्से की ख़्वारी को जिस्म पर ओड़ लेने वाली आदतें. वही ज़माने की होड़ और दौड़ में शिरकत. वही उजालों की तलब. वही ख़ुद को ख़ुद से बड़ा देखने वाला नज़रिया. सब कुछ वही.
मैं बार-बार इस सब से भागता हूं. बार-बार कोई चीज़ मुझे ठीक वहीं लाकर खड़ा कर देती है. शुक्र है, ऐसे में मेरे अलालपन ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा. वरना इतने सारे प्रलोभन मुझे दौड़ा-दौड़ा कर कामयाब लोगों के उस निज़ाम का हिस्सा बना लेते जिस निज़ाम को बदलने की नीयत से किसी उम्र में घर से बाहर निकला था.
अभी सोते-सोते जागा हूं. अब सोना नहीं खोना चाहता हूं. खोना चाहता हूं उन सब चीज़ों को जो मेरी नहीं हैं.
रूमी बाबा की तरफ लौट चलता हूं. वहां से सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है.
कोई मुझे पुकारा किया
औरों ने भी जो किया किया
ख़ुद को न तब जाना किया
न ख़ुद ने बताया ख़ुद को
अच्छा किया? बुरा किया?
न तो आंख को सूझा किया
न तो दिल को कुछ समझा किया
निकल पड़ा, बस को बाहर
जिस दम को ही सुना मैने
कोई मुझे पुकारा किया
(पुस्तक ‘जहान-ए-रूमी’ से)
